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द्रोण पर्व
अध्याय ६९
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द्रोण उवाच
दृष्ट्वा हनिष्यथ रिपुं क्षिप्रं गच्छत मन्दरम् |  ५६   क
यत्रास्ते तपसां योनिर्दक्षय़ज्ञविनाशनः |  ५६   ख
पिनाकी सर्वभूतेशो भगनेत्रनिपातनः ||  ५६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति