आदि पर्व  अध्याय ६८

वैशम्पाय़न उवाच

एतस्मात्कारणाद्राजन्पाणिग्रहणमिष्यते |  ४६   क
यदाप्नोति पतिर्भार्यामिह लोके परत्र च ||  ४६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति