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आदि पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
मन्यते पापकं कृत्वा न कश्चिद्वेत्ति मामिति |  २८   क
विदन्ति चैनं देवाश्च स्वश्चैवान्तरपूरुषः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति