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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
यदा रजस्वलां कृष्णां दुःशासनवशे स्थिताम् |  ४   क
सभाय़ां प्राहसः कर्ण क्व ते धर्मस्तदा गतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति