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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
यदा सभाय़ां कौन्तेय़मनक्षज्ञं युधिष्ठिरम् |  ३   क
अक्षज्ञः शकुनिर्जेता तदा धर्मः क्व ते गतः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति