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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
तपोऽस्ति तप्तं गुरवश्च तोषिता; मय़ा यदिष्टं सुहृदां तथा श्रुतम् |  २०   क
अनेन सत्येन निहन्त्वय़ं शरः; सुदंशितः कर्णमरिं ममाजितः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति