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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
अथाव्रवीद्वासुदेवो रथस्थो; राधेय़ दिष्ट्या स्मरसीह धर्मम् |  १   क
प्राय़ेण नीचा व्यसनेषु मग्ना; निन्दन्ति दैवं कुकृतं न तत्तत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति