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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
दुर्धर्षस्त्वेष शत्रूणां रणेषु भविता सदा |  ४८   क
अस्त्रस्यास्य प्रभावाद्वै व्येतु ते मानसो ज्वरः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति