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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
किरन्निषुगणांस्तिक्ष्णान्स्वरश्मीनिव भास्करः |  २   क
तापय़ामास तत्सैन्यं देहं व्याधिगणो यथा ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति