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उद्योग पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
माय़ां न सेवे भद्रं ते न वृथाधर्ममाचरे |  ५   क
शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद्वेद्मि जनार्दनम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति