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वन पर्व
अध्याय ६७
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वृहदश्व उवाच
तदवस्थां तु तां दृष्ट्वा सर्वमन्तःपुरं तदा |  ३   क
हाहाभूतमतीवासीद्भृशं च प्ररुरोद ह ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति