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वन पर्व
अध्याय ६७
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वृहदश्व उवाच
सा वै यथा समादिष्टा तत्रास्ते त्वत्प्रतीक्षिणी |  १०   क
दह्यमाना भृशं वाला वस्त्रार्धेनाभिसंवृता ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति