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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीन्मद्रराजो महात्मा; वैकर्तनं प्रेक्ष्य हि संहितेषुम् |  ७   क
न कर्ण ग्रीवामिषुरेष प्राप्स्यते; संलक्ष्य सन्धत्स्व शरं शिरोघ्नम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति