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विराट पर्व
अध्याय ६६
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अर्जुन उवाच
एष क्रोधवशान्हत्वा पर्वते गन्धमादने |  ४   क
सौगन्धिकानि दिव्यानि कृष्णार्थे समुपाहरत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति