वन पर्व  अध्याय ६६

सुदेव उवाच

प्रतिपत्कलुषेवेन्दोर्लेखा नाति विराजते |  ७   क
न चास्या नश्यते रूपं वपुर्मलसमाचितम् |  ७   ख
असंस्कृतमपि व्यक्तं भाति काञ्चनसंनिभम् ||  ७   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति