वन पर्व  अध्याय ६५

वृहदश्व उवाच

एवमुक्तस्तय़ा राजन्सुदेवो द्विजसत्तमः |  ३७   क
सुखोपविष्ट आचष्ट दमय़न्त्या यथातथम् ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति