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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
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इन्द्र उवाच
भुवः संस्कारं राजसंस्कारय़ोग; मभैक्षचर्यां पालनं च प्रजानाम् |  २   क
विद्याद्राजा सर्वभूतानुकम्पां; देहत्यागं चाहवे धर्ममग्र्यम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति