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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
दत्ता दाय़ा यथाशक्ति मित्राणां च प्रिय़ं कृतम् |  १९   क
अमित्रा वाधिताः सर्वे को नु स्वन्ततरो मय़ा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति