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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
प्रतपन्तं श्रिय़ा जुष्टं वर्तमानं च वन्धुषु |  १६   क
एवं कुर्यान्नरो यो हि स वै सञ्जय़ पूजितः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति