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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
अवैक्षत च धर्मात्मा द्रौपदीं पार्श्वतः स्थिताम् |  ४६   क
सा वेद तमभिप्राय़ं भर्तुश्चित्तवशानुगा ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति