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सभा पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो राज्ञो धृतराष्ट्रस्य गेहे; गोमाय़ुरुच्चैर्व्याहरदग्निहोत्रे |  २२   क
तं रासभाः प्रत्यभाषन्त राज; न्समन्ततः पक्षिणश्चैव रौद्राः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति