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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
किमन्यत्कालय़ोगाद्धि दिष्टमेव पराय़णम् |  ४६   क
मा च दोषं महाराज पाण्डवेषु निवेशय़ ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति