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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
रथाश्वमातङ्गपदातिभिस्ततः; परस्परं विप्रहतापतन्क्षितौ |  ४१   क
यथा सविद्युत्स्तनिता वलाहकाः; समास्थिता दिग्भ्य इवोग्रमारुतैः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति