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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
भारो हि धार्तराष्ट्रेण त्वय़ि सर्वः समर्पितः |  १४   क
तमुद्वह महावाहो यथाशक्ति यथावलम् |  १४   ख
जय़े स्याद्विपुला कीर्तिर्ध्रुवः स्वर्गः पराजय़े ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति