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वन पर्व
अध्याय ६२
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वृहदश्व उवाच
घोरान्नादान्विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले |  १०   क
वृक्षेष्वासज्य सम्भग्नाः पतिता विषमेषु च |  १०   ख
तथा तन्निहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम् ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति