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अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
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नारद उवाच
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवाः सर्षिगणाः पुरा |  ५   क
लोकतन्त्रं हि यज्ञाश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति