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अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
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नारद उवाच
प्राणवांश्चापि भवति रूपवांश्च तथा नृप |  २६   क
अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदः प्रोच्यते तु सः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति