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शल्य पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
ततस्ते प्राविशन्पार्था हतत्विट्कं हतेश्वरम् |  ४   क
दुर्योधनस्य शिविरं रङ्गवद्विसृते जने ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति