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शल्य पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपदेय़ाश्च सर्वशः |  ३   क
सर्वे चान्ये महेष्वासा यय़ुः स्वशिविराण्युत ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति