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उद्योग पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवमुक्त्वा स महाधनुष्मा; न्हित्वा सभां स्वं भवनं जगाम |  १४   क
भीष्मस्तु दुर्योधनमेव राज; न्मध्ये कुरूणां प्रहसन्नुवाच ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति