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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते |  १२२   क
मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ||  १२२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति