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सभा पर्व
अध्याय ६१
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कश्यप उवाच
स्त्रिय़ाः पत्या विहीनाय़ाः सार्थाद्भ्रष्टस्य चैव यत् |  ७४   क
अध्यूढाय़ाश्च यद्दुःखं साक्षिभिर्विहतस्य च ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति