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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
पितापि तव धर्मज्ञ गर्भे तस्मिन्महामते |  १७   क
अवर्धत यथाकालं शुक्लपक्षे यथा शशी ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति