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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
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युधिष्ठिर उवाच
इय़ं हि वसुसम्पूर्णा मही सागरमेखला |  १३   क
भवता विप्रहीणस्य न मे प्रीतिकरी भवेत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति