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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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युधिष्ठिर उवाच
निकृत्या निकृता नित्यं धृतराष्ट्रसुतैर्वय़म् |  ३२   क
वहूनि परुषाण्युक्त्वा वनं प्रस्थापिताः स्म ह ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति