शल्य पर्व  अध्याय ५९

वासुदेव उवाच

अरोषणो हि धर्मात्मा सततं धर्मवत्सलः |  २०   क
भवान्प्रख्याय़ते लोके तस्मात्संशाम्य मा क्रुधः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति