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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
नर्तकाश्चाप्यनृत्यन्त जगुर्गीतानि गाय़काः |  ३   क
कुरुवंशस्तवार्थानि मधुरं रक्तकण्ठिनः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति