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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
स्वस्तिकान्वर्धमानांश्च नन्द्यावर्तांश्च काञ्चनान् |  १९   क
माल्यं च जलकुम्भांश्च ज्वलितं च हुताशनम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति