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भीष्म पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
तस्यावर्जितनागस्य कार्ष्णिः परपुरञ्जय़ः |  ४४   क
राज्ञो रजतपुङ्खेन भल्लेनापहरच्छिरः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति