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वन पर्व
अध्याय ५८
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दमय़न्त्यु उवाच
विदर्भराजस्तत्र त्वां पूजय़िष्यति मानद |  ३४   क
तेन त्वं पूजितो राजन्सुखं वत्स्यसि नो गृहे ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति