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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
एष केतू रणे कृष्ण सूतपुत्रस्य दृश्यते |  ३   क
भीमसेनादय़श्चैते योधय़न्ति महारथान् |  ३   ख
एते द्रवन्ति पाञ्चालाः कर्णात्त्रस्ता जनार्दन ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति