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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
त्वं हि कृष्णौ रणे शक्तः संसाधय़ितुमाहवे |  २५   क
तवैष भारो राधेय़ प्रत्युद्याहि धनञ्जय़म् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति