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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
तं चोपहारं स्वकृतं नैशं नैत्यकमात्मनः |  ६१   क
ददर्श त्र्यम्वकाभ्याशे वासुदेवनिवेदितम् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति