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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्य कुण्डले ते तु राजानं पुनरव्रवीत् |  ४   क
किमेतद्गुह्यवचनं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति