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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
स्रग्धूपगन्धान्यनुलेपनानि; स्नानानि माल्यानि च मानवो यः |  ३८   क
दद्याद्द्विजेभ्यः स भवेदरोग; स्तथाभिरूपश्च नरेन्द्रलोके ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति