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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णशृङ्गैस्तु विभूषितानां; गवां सहस्रस्य नरः प्रदाता |  २७   क
प्राप्नोति पुण्यं दिवि देवलोक; मित्येवमाहुर्मुनिदेवसङ्घाः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति