आदि पर्व  अध्याय ५७

वैशम्पाय़न उवाच

जज्ञाते रूपसम्पन्नावश्विभ्यां तु यमावुभौ |  ९८   क
नकुलः सहदेवश्च गुरुशुश्रूषणे रतौ ||  ९८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति