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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
साप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यत |  ५२   क
पुरोक्ता या भगवता तिर्यग्योनिगता शुभे |  ५२   ख
मानुषौ जनय़ित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति