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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
तौ परस्परमासाद्य दंष्ट्राभ्यां द्विरदौ यथा |  ३३   क
अशोभेतां महाराज शोणितेन परिप्लुतौ ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति