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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
तौ दर्शय़न्तौ समरे युद्धक्रीडां समन्ततः |  ३२   क
गदाभ्यां सहसान्योन्यमाजघ्नतुररिन्दमौ ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति